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ताल के दस प्राण

ताल के दस प्राण

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भारतीय संगीत में हर ताल में 10 मुख्य बातें होती हैं। इन 10 तत्वों को ताल के 10 प्राण कहा जाता है। इनके बिना ताल की संरचना अधूरी है।

1. काल (Time)

काल का अर्थ है समय। सारा संसार काल के आधीन है। संगीत में जो समय लगता है उसे काल कहा जाता है। काल से ही तालों, तानों, मात्राओं आदि की रचना होती है।

2. क्रिया (Action)

किसी भी ताल की मात्राओं को गिनना क्रिया कहलाता है। ताली लगाना या हाथ पर मात्राओं को गिनना क्रिया के अंतर्गत आता है। यह दो प्रकार की होती है:

  • सशब्द क्रिया: गिनती करते समय आवाज़ या ताली बजाई जाती है।
  • निःशब्द क्रिया: मन ही मन या अंगुलियों पर बिना आवाज़ किए मात्राएं गिनी जाती हैं।

3. कला (Unit)

ताल में काल की इकाई को कला कहा जाता है। कला का अर्थ है अवयव। इस अवयव को मात्रा कहते हैं। इसी आधार पर विभाग बनते हैं।

4. मार्ग (Path)

निश्चित काल से युक्त मात्राओं के समूह को मार्ग कहते हैं। ताल की प्रथम मात्रा से अंतिम मात्रा की दूरी मार्ग के अंतर्गत आती है।

5. अंग (Limb)

ताल के समय में जो भिन्न-भिन्न भाग होते हैं वे 'अंग' कहलाते हैं। अंग छः प्रकार के हैं:

अंग चिन्ह मात्रा
अनुद्रुत1
द्रुत2
लघुI4
गुरु8
प्लुत12
काकपद+16

6. यति (Flow)

लय के चाल क्रम को यति कहा जाता है। इसके पाँच प्रकार हैं:

  • समा: आरम्भ, मध्य तथा अंत में समान लय से प्रयुक्त होना समा यति है।
  • स्त्रोतोगता: आदि में बिलम्बित, मध्य में मध्यलय तथा अंत में द्रुत लय हो तो उसे सोतोगता यति कहा जाता है।
  • मृदंगा: जिसके आरम्भ तथा अंत में दुत लय, बीच में मध्य लय हो वह मृदंगा यति कहलाता है।
  • पिपीलिका: जब आदि तथा अंत में विलंबित लय हो तथा बीच में दुत लय हो तो यह पिपीलिका यति होगी।
  • गोपुच्छा: जो यति पहले दुत हो फिर मध्य तथ अंत में विलम्बित हो वह गोपुच्छा यति है।

7. प्रस्तार (Expansion)

ताल के आवर्तन को बजाने के पश्चात् उस ताल के बोलों को विभिन्न रूपों में विकसित करने को प्रस्तार कहते हैं (जैसे: कायदा, पल्टा, रेला)।

8. ग्रह (Starting Point)

ताल की जिस मात्रा से गीत आरम्भ हो, उसे ग्रह कहते हैं:

  • सम ग्रह: जब गीत तथा ताल एक ही स्थान से आरम्भ हो तो उसे सम ग्रह कहते हैं।
  • विषम ग्रह: जब सम निकलने के बाद गाना शुरु किया जाए तो वह विषम ग्रह होगा।
  • अतीत ग्रह: सम का अंत होने पर जब गाना शुरू करते हैं तो उस स्थान को अतीत ग्रह कहते हैं।
  • अनागत ग्रह: गायन का आरम्भ पहले ही हो जाए तथा बाद में ताल आरम्भ हो, तो उसे अनागत ग्रह कहते हैं।

9. लय (Tempo)

ताल की गति को लय कहते हैं। इसके मुख्य तीन प्रकार हैं:

  • विलम्बित लय: जिस लय की गति बहुत धीमी हो उसे विलम्बित लय कहते है। इसकी प्रकृति मुख्यत गंभीर रहती है।
  • मध्य लय: इसमें लय ही गति सामान्य होती है। न तो बहुत तेज, न ही बहुत धीमी।
  • द्रुत लय: इसकी प्रकृति चंचल होती है। यह लय तेज होती है।

10. जाति (Classification)

बोलों के अक्षरों के अनुसार 5 जातियाँ होती हैं (लघु की मात्राओं के आधार पर):

तिस्र3 मात्राएं
चतस्र4 मात्राएं
खंड5 मात्राएं
मिश्र7 मात्राएं
संकीर्ण9 मात्राएं

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