तीनताल
भारतीय शास्त्रीय संगीत में तालों का विशेष महत्व है।
इन्हीं तालों में एक अत्यंत लोकप्रिय और आधारभूत ताल है— तीनताल।
तीनताल को ही त्रिताल तथा आदिताल के नाम से भी जाना जाता है।
तीनताल को त्रिताल इसलिए कहा जाता है, क्योंकि इसमें तीन प्रमुख तालियाँ होती हैं।
और इसे आदिताल इसलिए कहा जाता है, क्योंकि यह भारतीय ताल-प्रणाली की
सबसे प्राचीन और मूल आधार ताल मानी जाती है।
तीनताल में कुल सोलह मात्राएँ होती हैं, जिन्हें चार समान विभागों में बाँटा गया है।
प्रत्येक विभाग में चार-चार मात्राएँ होती हैं।
इस ताल में
पहली, पाँचवीं और तेरहवीं मात्रा पर ताली, जबकि नौवीं मात्रा पर खाली होती है।
तीनताल का प्रचलित ठेका इस प्रकार है—
धा धिं धिं धा । धा धिं धिं धा । धा तिं तिं ता । ता धिं धिं धा।
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तीनताल को विलंबित, मध्य तथा द्रुत—
तीनों लयों में गाया और बजाया जाता है।
इसका प्रयोग ख्याल, ठुमरी, भजन, ग़ज़ल तथा वाद्य-संगीत में व्यापक रूप से होता है।
इसी कारण तीनताल भारतीय शास्त्रीय संगीत की सबसे महत्वपूर्ण और लोकप्रिय तालों में गिनी जाती है।
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