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अलंकार (Alankar)
भारतीय शास्त्रीय संगीत में अलंकार का विशेष स्थान है। नियम के अनुसार स्वरों के क्रमबद्ध चलने को अलंकार कहा जाता है। अलंकार कई छोटी-छोटी कड़ियों से मिलकर बनता है, जो आपस में जुड़ी होती हैं।
प्रत्येक अलंकार में मध्य सप्तक के ‘सा’ से तार सप्तक के ‘सा’ तक स्वरों का चढ़ाव (आरोह) तथा तार सप्तक के ‘सा’ से मध्य सप्तक के ‘सा’ तक स्वरों का उतराव (अवरोह) होता है।
संगीत दर्पण
ग्रंथ में अलंकार की परिभाषा इस प्रकार दी गई है:
“विशिष्ट-वर्ण-सन्दर्भमलंकार प्रचक्षते”
अर्थात् नियमित और निश्चित स्वर-समूह को अलंकार कहा जाता है।
💡 अलंकार में अवरोह, आरोह का ठीक उलटा होता है।
🔼 आरोह
सारेग, रेगम, गमप, मपध, पधनि, धनिसां
🔽 अवरोह
सांनिध, निधप, धपम, पमग, मगरे, गरेसा
🎼 अलंकार का महत्त्व
गायन और वादन के विद्यार्थियों को प्रतिदिन अलंकार का अभ्यास करना चाहिए। इससे कंठ में लोच आता है और वाद्य यंत्रों पर उँगलियाँ सहजता से चलने लगती हैं। यह संगीत की नींव को मजबूत करने का सबसे प्रभावी तरीका है।